Tuesday, 27 February 2018

पत्रकार वफादार या नेता ईमानदार!


अगर आपको याद हो तो निरव मोदी और मेहुल चौकसी के मामले को उजागर हुए 10 दिन से ऊपर हो चुके हैं। पता नहीं आपको याद है भी की नहीं, कि इस घपले के तुरन्त बाद ही देश की सरकार से लेकर पूरी संस्थान इस कदर इन दोनों डिफॉल्टर को देश वापसी और देश की संपत्ति को लुटने वालों से वापस लाने में जुट गई थी जिससे लगा की सच में सरकार मेहनत कर रही है इस बार भी दिखावे में पूरी मीडिया हाउस में उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया दिखाया गया और 7 दिनों के अंदर उनके पासपोर्ट को रद्द ना करने का कारण भी पूछा गया। इसी बीच सरकार के कई मंत्रियों ने प्रधानमंत्री और अपनी पार्टी पर इसकी आंच पहुंचने ना देने का भरपूर प्रयास भी किया जिसमें खुद को दूध का धुला दिखाने के लिए कई झूठ और विपक्षियों पर प्रहार करने से भी नहीं कतराए।
भले ही सरकार की तरफ से मांगे गए जवाब इन दोनों मामा भगीने ने नहीं दिया और सरकार को कशमकश में फंसा दिया, मगर निरव मोदी ने उल्टा भारतीय प्रतिष्ठान पर ही आरोप लगा दिया, उसने पीएनबी पर 11000 करोड़ के अपने लोन को झूठ बोलने और मनगढ़ंत कहानी बता दिया। मोदी ने सरकार को भले ही अपने पासपोर्ट का जवाब नहीं दिया मगर खुद के लीये कर्ज को चुकाने से साफ मना कर दिया और इसके विपरीत सीआईबी के द्वारा निरव के जब्त सम्पत्ति को ही अपने लोन को चुकाने के लिए प्रयाप्त बताया। इस बात को ईडी तक ने स्वीकार कर लिया कि इनकी इतनी सम्पत्ति कर्ज को चुकाने के लिए काफी है। नीरव ने पीएनबी के लगाए गए कर्ज को साफ तौर पर नकार दिया। भले ही सरकार खुद के बचाव में तीव्रता से उतर गई हो मगर सरकारी विभाग पर भगोड़े के लांछन पर किसी तरह की प्रतिक्रिया तक देने से बचती रही। जबकि इस मामले में पीएनबी ने आगे की जानकारी में 27 फरवरी को इस घपले की राशि में निरव के नाम और भी 1400 करोड़ रुपए का ठीकरा फोड़ दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम को मीडिया बहुत मासूम बनकर प्रखरता से देश की जनता तक ईमानदारी से पहुंचाती रही और बखूबी से टीआरपी कमाने का जरिया बना लिया। भले ही आज की मीडिया किसी भी ताजा और प्रमुख खबरों को तेज़ी से उठा देती है और उसे कुछ दिनों तक खास खबर बनाकर चलाती भी है मगर उसका परिणाम अधूरा ही छोड़ देती है जिससे समाज की उन विषाद वाले मुद्दे पर लगाम लग जाती है जिससे हमारे स्वतंत्र देश की जनता भी इससे अछूती रह जाती है। इसके पीछे कुछ राजनीतिक पहल भी होती है जो मीडिया के साथ – साथ जनता का ध्यान भटकाने में भी सक्षम हो जाती है। वैसे इसके पीछे गोदी मीडिया का भी बड़ा हाथ होता है जो कुछ एक  मुद्दे के फिराक में बैठे होते हैं जिससे अपने मालिक की समस्या को जल्द से जल्द सुलझाया जा सके और राजनीतिक दल अपने लूट पात में बिना किसी घबराहट के लगातार बरकरार रह सके। कुछ ऐसे ही मामले हम आपको बताते है जो इस नापाक कारनामे को दर्शाते हैं। महेश शाह, विजय माल्या, ललित मोदी, निरव मोदी, जैसे कई  अनगिनत नाम हैं जो खबरों की कुछ दिनों के लिए सुर्खियां बने और फिर न जाने कहां फुर हो गए। ये ना सिर्फ घोटाले के लिए सदयंत्र के रूप में अवतार में लाया गया बल्कि देश के असल हीरोज और युवाओं की कुर्बानी से भी खेलने की कोशिश की जाती रही है।
मसलन जब किसी दल की क्षति की खबर उभरकर सामने आती है तो उसे हमेशा चैनल वाले ज्यादा महत्ता नहीं देते और कुछ ही तथ्यों के साथ लोगों को भूलवाने का हर प्रयत्न करते है जिससे राजनीतिक दल की छवि के साथ खुद की आय को भी बरकरार रखते हैं।
 जब हम इसके विपरित देखते हैं तो वहीं ताज़ा उदाहरण को देखें तो प्रिया प्रकाश वारियर की बेतुकी खबरों और श्रीदेवी की मृत्यु की पल-पल की अपडेट्स देने में मीडिया चैनल किसी भी स्तर पर जाने को तैयार दिखते है और उनकी रिपोर्ट्स को तोड़ मरोड़ कर बढ़ा-चढ़ा कर पेश की जाती है। ऐसे मामलों की खबरों पर न केवल ज्यादा वक्त के लिए खबरों में बरकरार रखा जाता है बल्कि इसमें अपने विचार को भी व्यक्त किए जाते है और आखिरी मंजिल तक उस बेकार की बातों को कवर कर दिखाया जाता है तो ऐसे में मेरा आपसे यही पूछना है कि क्या उन अपराधियों, भगोड़े, जालिमों पर तथ्यों को जुटा कर इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की जानी चाहिए और ऐसे मुद्दों को तब तक नहीं चलाना चाहिए जब तक उस घोर अन्याय और अपराधों के खिलाफ किसी तरह की शख्त कार्यवाही नहीं हो जाए? जिससे कि समाज के लोगों के बीच जागरूकता के साथ सरकार की आंखे खुली रहे और देश को एक रास्ता दिखाया जा सके।
आज तो हर मुद्दे और छिपाने के लिए दूसरे झूठ का सहारा सरकार को लेना पड़ रहा है। तो क्या देश की पत्रकारिता के साथ जनता भी कुंठित मानसिकता की सोच में जीने लगी है! क्या देश में किसी के जुबान की अहमियत पूरी तरह से ख़तम हो गई है! क्या पत्रकारों के साथ-साथ जनता भी अपने भविष्य को दांव पर लगाने को तैयार हो गई है! क्या आज के लोगों को तथ्य से ज्यादा लोभ-लुभावन बातें ही पसंद आने लगी है! आखिर ऐसी क्या वजह है जो पत्रकारिता को दलदल में ही टीआरपी दिखाई देने लगे हैं! आखिर ऐसी कौन सी वजहें है जिससे पत्रकारिता के मतलब गायब होते चले जा रहे हैं! क्यों लोग असलियत जानने तक से हिचकिचाने लगे है और काम की जगह आकर्षित भाषणों को अहमियत देने लगे हैं! क्या आज की तारीख में देश की जनता से ईमानदार नेतागण हो चुके हैं?