Tuesday, 3 April 2018

क्या राजनीतिक दल जाति-धर्म को बांटना ही वोट बैंक का आधार समझती हैं!

1989 में बना अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम पर महाराष्ट्र के मामले में 20 मार्च को देश के सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई करते हुए इस कानून में संशोधन कर दिया है। हमारा भारत देश संसदीय लोकतांत्रिक देश है जिसमें न्यायपालिका की एक अहम भूमिका है। राजनीति से ऊपर उठकर देश के न्यायपालिका से उम्मीद की जाती है। मगर जब देश की पहली स्तंभ की कार्यशैली पर संदेह और उस पर दबाव बनाया जाता है तो परिस्थिति ठीक आज की तरह हो जाती है। जैसा कि आपको याद होगा कि कुछ दिनों पहले ही देश के सर्वोच्च अदालत के चार वरिष्ठ जजों ने आपत्ति जाहिर करते हुए देश की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े किए थे। और एक बार फिर से उच्च न्यायालय को दबाव में देखा जा रहा है। देश के सुप्रीम कोर्ट ने तो पीड़ित और शोषित समुदाय को उनके हित और न्याय के लिए एससी-एसटी एक्ट में बदलाव किया है। इस अधिनियम के तहत निचले समुदाय के लोगों को उठाने का केंद्र सरकार की ओर से एक सफल प्रयास था जिससे लोगों को समान अधिकार और न्याय के अधिकार का देवता माना गया। मगर 28 साल के बाद इस एक्ट में सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम के दुरुपयोग पर बंदिश लगाने के लिए दर्ज मुकदमों में बिना जांच के किसी भी लोक सेवक को गिरफ्तार न किया जाए और सामान्य नागरिकों को भी कानून के तहत पूछताछ के बाद ही गिरफ्तार करने का फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के 2 जजों की बेंच जस्टिस एके गोयल और यू यू ललित ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए एससी एसटी एक्ट के तहत FIR  दर्ज होने पर गिरफ्तारी से पहले आरोपों की डीजीपी स्तर के अधिकारियों की जांच की जाएगी।  जिसके बाद से दलित समुदाय के साथ-साथ राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सारी पार्टियां अपने वोट बैंक को बचाने में जोर-शोर से लग चुकी है। वैसे तो 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान कई लोगों को अधूरी जानकारी भी रही है। फेक न्यूज़ से लोगों में दलितों के आरक्षण को खत्म करने की भी अफवाहें फैलाई गई। और दलित समुदाय को हिंसा भड़काने और उकसाने का भरपूर प्रयास किया गया। देशभर में दलित समुदाय के भारत बंद में विरोध प्रदर्शन ने हर राज्यों के कोने को हिंसात्मक और आक्रमक बना  दिया। इस एक दिन के जोर शोर के प्रदर्शन ने पूरी राजनीति को हिलाकर रख दिया और सभी दलों ने अपने पलडे को साफ करने की कोशिश में जुट गए। जहां एक तरफ केंद्र सरकार भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले पर पुनर्विचार करने की याचिका दायर कर दी और अलग-अलग नेताओं ने अपने वोट बैंक को बनाए रखने के लिए दलितों के साथ सुर में सुर मिला कर सुप्रीम कोर्ट को ही गलत साबित कर दिया। अपनी पुनर्विचार याचिका में केंद्र सरकार का मानना हैं कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ 3 तथ्यों के आधार पर ही कानून को रद्द कर सकती है, इसमें अगर मौलिक अधिकार का हनन हों, अगर कानून गलत बनाया गया हो और अगर किसी कानून को बनाने का अधिकार संसद के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता हो तो। इसके साथ ही सरकार की ये भी दलील है कि कोर्ट ये नहीं कह सकता है कि कानून का स्वरूप कैसा हो, क्योंकि कानून बनाने का अधिकार केवल संसद और विधानसभा के पास है।गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा हमारी सरकार ने अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को‘ कमजोर’ करने के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी है। साथ ही उन्होंने राजनीतिक पार्टियों से कहा कि वे यह सुनिश्चित करें कि विरोध प्रदर्शन की आड़ में किसी तरह की सांप्रदायिक हिंसा को अंजाम न दिया जाए। तो वही विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पत्रकारों से बातचीत में कांग्रेस दलितों की दुर्दशा को लेकर आरएसएस और भाजपा पर हमला बोला और कहा कि वह समुदाय के उन ‘‘भाईयों और बहनों’’ को सलाम करते हैं जो मोदी सरकार से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे हैं। मगर क्या इस देश में ऐसे सहनशील मुद्दे को राजनीति में तब्दील करना ही राजनीतिक दलों का काम रह गया है! क्या सरकार नेपाली भाषा ऊपर उठ चुकी है! क्या अब फेक न्यूज़ ही वोट बैंक का जरिया बनकर रह जाएगी! जिस तरह से सोशल मीडिया सिर चढ़कर बोल रहा है क्या यह देश के भविष्य का प्रारूप बनेगा। जाति और धर्म के नाम पर राजनीति किस हद तक सही है! क्या देश में जनता महंगाई और मूलभूत मुद्दे से ऊपर उठकर वोट करने में विश्वास करने लगी है! जातीय समीकरण को राजनीतिक मुद्दे से हटाने के लिए और देश के हित और विकास के लिए आरक्षण को न्यायपालिका को सौंप देना चाहिए।