नौकरी व्यवस्था पाने वाले अभ्यर्थियों के बीच यूपीएससी के बाद दूसरा स्थान रखता है एसएससी सीजीएल। मगर सीजीएल और यूपीएससी के बीच का फर्क अक्सर गहराता देखा गया है। दोनों ही परीक्षा केंद्र सरकार की व्यवस्था से जुड़ी है। जिस तरह आए दिन सीजीएल कंबाइंड ग्रैजुएट लेवल के स्तर को स्टाफ सिलेक्शन कमीशन और केंद्र सरकार की मिलीभगत से गिराने की कोशिश चल रही है उससे ना सिर्फ इन पदों की गरिमा लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों के बीच चरम सीमा पर पहुंच गई है बल्कि अभ्यर्थियों को भी इस उच्च कोटि के पदों की तैयारी के लिए सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है। आखिर इस नौकरी व्यवस्था में किसे गुनहगार ठहराया जाए? क्या इसमें केंद्र सरकार की मिलीभगत का आरोप नाजायज है? आखिर क्यों लगातार कुछ सालों में इस परीक्षा का कार्यभार संभाल रहे Staff Selection Commission के घड़ियाली आंसू देखने को मिलते हैं क्या एसएससी संस्था युवाओं को रोजगार देने में अक्षम है या फिर किसी के दबाव में लाचार है। आखिर कारण जो भी हो मगर युवाओं के साथ इस तरह की कोताही पूरा देश भुगत रहा है। 2013 में हुए धांधली के बाद 2017 में दोबारा घोटालेबाजी न सिर्फ एसएससी और सुप्रीम कोर्ट को ही लचर दिखाता है बल्कि युवाओं का विश्वास सरकारी संस्थानों से दरकिनार होता दिख रहा है।
2017 सीजीएल में बड़े स्तर पर हुए धांधली का आज सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाने जा रही है। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले ही केंद्र सरकार को साफ संकेत दे रखा है कि इस घोटाले भरे परीक्षा को सरकार और एसएससी आपस में तालमेल बिठा कर खुद इस परीक्षा को रद्द करके क्रेडिट अपनी ओर ले जाए वर्ना अगले फैसले के लिए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से एकमात्र धांधली वाले बच्चे के प्रवेश तक को भी बिल्कुल समर्थन नहीं करने की बात कही थी।
तो ऐसे में उच्चतम न्यायालय में चल रहे केस में इस परीक्षा को रद्द करने की ज्यादा संभावना दिखती है। मैं भी धांधली बाजी के विपक्ष में खड़ा हूं और सुप्रीम कोर्ट का पूर्ण रूप से समर्थन करता हूं। भले ही वो अभ्यर्थी जो पूरे परीक्षा में सफल हुए हैं और अपने चयनित पत्र के इंतजार में बैठे है उन्हें भी देश हित में योगदान और बेईमानों के खिलाफ अपनी शुरुआती करियर से ही ईमानदारी की मिसाल कायम करनी चाहिए। चयनित ईमानदार अभ्यर्थियों को दिलासा के अलावा कुछ नहीं दिया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पूर्व मेरी राय यह है कि कोर्ट टायर-2 की परीक्षा को अवश्य स्थगित करे मगर सरकार और एसएससी को भारी फटकार लगाने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए। 2017 के परीक्षा परिणाम घोषित से लेकर नौकरी देने तक की प्रक्रिया को समयावधि में बांधकर फैसला देना चाहिए। अभी से 5 महीने के भीतर ईमानदारी से पूरी परीक्षा, नतीजे और भर्ती प्रक्रिया को समाप्त करना ही एसएससी और सरकार के लिए सबक हो सकती है।
2017 सीजीएल में बड़े स्तर पर हुए धांधली का आज सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाने जा रही है। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले ही केंद्र सरकार को साफ संकेत दे रखा है कि इस घोटाले भरे परीक्षा को सरकार और एसएससी आपस में तालमेल बिठा कर खुद इस परीक्षा को रद्द करके क्रेडिट अपनी ओर ले जाए वर्ना अगले फैसले के लिए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से एकमात्र धांधली वाले बच्चे के प्रवेश तक को भी बिल्कुल समर्थन नहीं करने की बात कही थी।
तो ऐसे में उच्चतम न्यायालय में चल रहे केस में इस परीक्षा को रद्द करने की ज्यादा संभावना दिखती है। मैं भी धांधली बाजी के विपक्ष में खड़ा हूं और सुप्रीम कोर्ट का पूर्ण रूप से समर्थन करता हूं। भले ही वो अभ्यर्थी जो पूरे परीक्षा में सफल हुए हैं और अपने चयनित पत्र के इंतजार में बैठे है उन्हें भी देश हित में योगदान और बेईमानों के खिलाफ अपनी शुरुआती करियर से ही ईमानदारी की मिसाल कायम करनी चाहिए। चयनित ईमानदार अभ्यर्थियों को दिलासा के अलावा कुछ नहीं दिया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पूर्व मेरी राय यह है कि कोर्ट टायर-2 की परीक्षा को अवश्य स्थगित करे मगर सरकार और एसएससी को भारी फटकार लगाने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए। 2017 के परीक्षा परिणाम घोषित से लेकर नौकरी देने तक की प्रक्रिया को समयावधि में बांधकर फैसला देना चाहिए। अभी से 5 महीने के भीतर ईमानदारी से पूरी परीक्षा, नतीजे और भर्ती प्रक्रिया को समाप्त करना ही एसएससी और सरकार के लिए सबक हो सकती है।