बीते एक दशक से आप सभी “जयंत की आवाज़” की प्रखरता को देखते आ रहे हैं मगर लंबे ब्रेक के बाद एक अलग अंदाज़ में आलेख की शुरुआत कर रहा हूं, इसका उद्देश्य सीधा संवाद और व्यवस्था की पारदर्शिता को आईना दिखाना होगा। हेडलाइन में भारत देश की चर्चा की गई है मगर इस लेख को बिहार तक ही केंद्रित किया जाएगा, यह इसलिए नहीं की देश में कमीशनखोरी व्यवस्था नहीं स्थापित है बल्कि चुनावी माहौल में कुव्यवस्था की समीक्षा जनता के बीच हो सके।
हमारा समाज कार्यपालिका में अधिकारियों के पद पर चयन को इज़्ज़त के तौर पर तरज़ीह देता रहा है मगर समाज को सबसे अधिक खोखला अंग्रेज़ों की बनाई इस अफ़सरशाही की कुव्यवस्था ने ही बनाया है। सरकारी कर्मी के तौर पर आजीवन निर्धारित बेहतर वेतन के साथ समाज पर ज़ोर आज़माइश की पूरी छूट मिलती है जहाँ विधायिका की कार्य योजना को धरातल पर उतारने की आड़ में आमजन की ख़ुशी का एहसान दिखाकर उनसे ही पैसे वसूले जाते हैं।
यही नहीं, इन बुद्धिजीवियों द्वारा देश की जनता के हज़ारों करोड़ रुपए के विकास कार्यों की योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर उतारने वाले ठेकेदारों से जाँच के नाम पर विकास कार्यों के लिए निर्धारित फण्ड के 30-40 प्रतिशत पैसे को सरकारी बाबुओं की चरण में चढ़ावा चढ़ाने का प्रचलन सर्वविधित है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, सड़क, पेयजल आपूर्ति सहित अन्य सभी विभागों में जांच के नाम पर आलाधिकारियों से लेकर निम्न स्तर के कर्मचारियों को चढ़ावा प्रणाली की खुली छूट है।
यहाँ सवाल यह उठता है कि अंग्रेज़ी शासन में गुलाम भारतवासियों पर शासन हेतु बनाई गई व्यवस्था को उसी आधार पर उतारना क्या लोकतांत्रिक सरकार की जनता के प्रति संवेदनहीनता को नहीं दर्शाता है?
देश में करीबन 1.5 प्रतिशत आबादी के हिस्से के पदों पर परीक्षा की कुव्यवस्था वाली प्रणाली से सहनशक्ति और विचारहीन अभ्यर्थियों को चयन के शिकंजे में लेने का प्रारूप सरकार ने तैयार कर रखा है क्या? सरकार अपनी रोटी सेंकने के लिए क्या विभिन्न विभागों में सरकारी कर्मियों के तंत्र को उलझाकर समेत दिया है? क्या पारदर्शिता और साफ़ नीयत को 1.5 प्रतिशत वाली नौकरी व्यवस्था में स्थापित कर पाना असंभव है चूँकि देश की 98.5 प्रतिशत वाली निजी नौकरी व्यवसाय वाली व्यवस्था का संचालन तो बेहतर और दुरुस्त तरीक़े से हो रहा है।
हालांकि, कई ज़िलाधिकारियों की कुछ स्पष्ट कार्ययोजनाओं से उनकी नीयत तो साफ़ झलकती है मगर दूसरी तरफ़ करोड़ों लोगों की ख़्वाब की नौकरी आईएएस-आईपीएस के सैकड़ों आलाधिकारियों को बदलाव की एक छोटी सी कुर्सी के लिए अपने पदों को छोड़ते देखा जाता रहा है। क्या यह त्याग उनकी सामाजिक व्यवस्था में सुधार की जिज्ञासा को दर्शाता है या ढलती उम्र के इस पड़ाव में निजी तौर पर अर्जित की गई पैसों की खेप के मैनेजमेंट में चुनौती की समस्या से दूरी बनाकर स्वास्थ्य को बेहतर रखने की दिशा में यह कदम उठाए जाते हैं?
चुनावी लिहाज़ से मैंने इस आलेख को बिहार केंद्रित रखने की बात लिखी थी और मैं उसी दिशा में हूं। कहा जाता है बिहार में अफसरशाही की कुव्यवस्था अपनी चरम पर है, आख़िर ऐसा क्यों? बिहार में संवैधानिक व्यवस्था के तहत लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है, तो अफ़सरों की ठाठ और आमजनों की गाँठ बनी कैसे, कभी सोचा है आपने?
दरअसल, बिहार में लोकतंत्र के तहत शासन व्यवस्था में अनपढ़ों की नियुक्ति हुई, इसमें आलाकमान को अनपढ़ नहीं कहा गया है चूँकि सर्वज्ञात है कि शासन के आलाकमान काफ़ी शिक्षित रहे हैं मगर शासन व्यवस्था में लोकतंत्र की ताक़त से अनपढ़ को नेतृत्व मिला। हालांकि, कमज़ोर पक्ष को कमान मिलने की व्यवस्था बेहतरीन भी है मगर यहाँ खेल शुरू होता है बुद्धिजीवी अफ़सरों का। बिहार की हरेक कार्ययोजना का फ़ैसला और सत्ताधीश नेताओं के भाषण का प्रारूप तैयार करना अफ़सरशाही ताक़त बन गई और बिहार के शासन की दिशा हाँकने का तंत्र अफ़सरों के रूप में प्रशासन व्यवस्था के हाथों की लकीर बन गई।
मैंने अपनी पत्रकारिता पेशा के दौरान सत्ताधीश नेताओं, नौकरशाह और निजी तंत्र को काफ़ी क़रीब से देखा है। आज कमीशनखोर पर बात की है और अगले संस्करण में संविधान के अंतर्गत ही आने वाली निजी व्यवस्था की परते उधेड़ी जाएंगी।