Sunday, 14 January 2018

गुजरात हाईकोर्ट से तड़ीपार घोषित के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के जज ने उठाए सवाल!


मोदी सरकार के चुनावी चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह को सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2010 में तड़ीपार घोषित कर दिया था। सोहराबुद्दीन,उसकी पत्नी की 2005 में एनकाउंटर में हत्या कर दी गई थी। जिसके बाद सोहराबुद्दीन के साथी प्रजापति की भी मर्डर करा दी गई। सोहराबुद्दीन की हत्या की जांच में सीबीआई की अदालत ने डीआईजी डीजी बंजारा और SP राजकुमार को गिरफ्तार किया गया था। बंजारा के कड़े आरोप के बाद अमित शाह पर भी मुकदमा दर्ज किया गया और जुलाई 2010 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन और प्रजापति दोनों के मर्डर को एक ही मामला करार दिया जिसके बाद प्रजापति मर्डर केस में भी अमित शाह का नाम दोबारा दर्ज किया गया। 2012 में अमित शाह को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई और उसी साल अमित शाह अहमदाबाद के नारायणपुरा से विधायक का चुनाव जीते। 2013 में गुजरात के एक उपचुनाव में कांग्रेस ने तड़ीपार अमित शाह को चुनावी रैलियों में शामिल होने के लिए गुजरात हाईकोर्ट में शिकायत दर्ज की थी और इसे कोर्ट की अवहेलना बताया था।
भारत की 16वीं लोकसभा चुनाव से 10 महीने पहले जून 2013 में अमित शाह को यूपी दामोदर सौंपा गया था। जिसे उन्होंने 10 सीटों वाली BJP पार्टी को यूपी में 71 सीट से जीत दिलाई।
सोहराबुद्दीन मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के झिंझरिया गांव का निवासी था। गुजरात पुलिस ने उसे कथित फर्जी मुठभेड़ में 25 नवंबर 2005 को उसके बाद उसकी बीवी कौशल वी और उसके अंडरवर्ल्ड साथी तुलसीराम प्रजापति को मार गिराया था। सोहराबुद्दीन शेख पर 90 के दशक में हथियार तस्करी का मामला दर्ज था। साल 1995 में सोहराबुद्दीन के मध्य प्रदेश स्थित घर से 40 एके-47 बंदूक बरामद हुए थे।
सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई पहले जज की ट्रांसफर कर दी गई और बाद में यह मामला जस्टिस बृज गोपाल लोया को सौंप दिया गया। 1 दिसंबर 2014 को सीबीआई अदालत के जज की हत्या कर दी गई। और अगले जज ने इस मामले में अमित शाह को बरी कर दिया।  जस्टिस लोया को अपनी सहकर्मी की बेटी की शादी में नागपुर जाने का जरा भी मन नहीं था मगर उनके दोस्त साथी जज घर आकर उन्हें उस समारोह में ले गए, यह बात 1 दिसंबर 2014 की है जस्टिस लोया अपने दोस्तों के साथ अपनी सहकर्मी जज सपना जोशी की बेटी की शादी में तो जरुर चल कर गए मगर उधर से उनकी लाश उनके पिता के घर भेज दिया गया। इस मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया जिसकी किसी भी तरह की जांच नहीं कराई गई। यह मुद्दा उस दिन के बाद से शांत हो गया मगर मौत के लगभग 3 साल बाद उनके परिजन ने इसे उठाया तो यह मामला मीडिया और लोगों तक पहुंचा। जस्टिस बृज गोपाल लोया की बहन खुद एक डॉक्टर है जिन्होंने हार्ट अटैक के वजह को बेबुनियाद बताया और इसकी जांच के आदेश की मांग करने लगी। जस्टिस लोया के परिवार जनों ने कारवां मैग्जीन से साक्षात्कार में पोस्टमार्टम की रिपोर्ट पर कई सवाल खड़े किए हैं-
लोया की मौत के समय को स्पष्ट नहीं किया गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार लोया की मौत 6:15 पर हुई है जबकि उनके परिजनों को 5:00 बजे ही फोन कर उनकी मौत की खबर दी जा चुकी थी।

लोया की मौत दिल के दौरे से होना बताया गया, जबकि परिजनों ने उनके कपड़ों पर खून के धब्बे देखे थे।

लोया के पिता के अनुसार उनके सिर पर चोट भी थी.
परिवार को लोया का फोन मौत के कई दिन बाद लौटाया गया, जिसमें से डाटा डिलीट किया गया था।

बताया गया कि रात में दिल का दौरा पड़ने के बाद नागपुर के रवि भवन में ठहरे लोया को ऑटो रिक्शा से अस्पताल ले जाया गया था। लोया की बहन ने रिपोर्टर से बात करते हुए पूछा कि क्या इतने वीआईपी लोगों के ठहरने की व्यवस्था होने के बावजूद रवि भवन में कोई गाड़ी नहीं थी, जो उन्हें अस्पताल ले  जा सकती थी।

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि रवि भवन से सबसे नज़दीकी ऑटो स्टैंड की दूरी दो किलोमीटर है। ऐसे में आधी रात को ऑटो मिलना कैसे संभव हुआ।

एक सवाल ईश्वर बहेटी नाम के आरएसएस कार्यकर्ता पर भी उठाया गया है। इसी कार्यकर्ता ने लोया की मौत के बाद पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव ले जाने की जानकारी परिजनों को दी, साथ ही लोया का फोन भी परिवार को बहेटी ने ही लौटाया था।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के हर पन्ने पर एक व्यक्ति के दस्तखत हैं, जिसके नीचे मृतक से संबंध मराठी में ‘चचेरा भाई’ लिखा है, लेकिन परिवार का कहना है कि परिवार में ऐसा कोई व्यक्ति ही नहीं है।
रिपोर्ट कहती है कि लोया की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, तो फिर पोस्टमॉर्टम की ज़रूरत क्यों पड़ी?
इसके अलावा पोस्टमॉर्टम के बाद पंचनामा भी नहीं भरा गया।
जबकि लोया की मौत के 29 दिनों बाद ही इस केस की सुनवाई किए बिना अमित शाह को बरी कर दिया गया।उसके बाद आज तक इस मामले में 11 अन्य लोग, जिनमें गुजरात पुलिस के आला अधिकारी भी हैं, को बरी किया जा चुका है।
गौर करने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस मामले की जांच संभाल रही प्रमुख संस्था सीबीआई ने इस फैसले के ख़िलाफ़ कोई अपील नहीं की है। इससे पहले जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए गये थे, तब दो बातें स्पष्ट रूप से कही गयी थीं, पहली- इस मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर हो, दूसरी- एक ही जज इस जांच को शुरू से अंत तक देखे। लेकिन शीर्ष अदालत के दूसरे आदेश की अवहेलना की गई। मामले की जांच की शुरुआत जज जेटी उत्पत ने की, लेकिन अचानक वे इससे हटा दिए गए। 6 जून 2014 को जज उत्पत ने अमित शाह को इस मामले की सुनवाई में उपस्थित न होने को लेकर फटकार लगायी और उन्हें 26 जून को पेश होने का आदेश दिया था मगर 25 जून को 2014 को उत्पत का तबादला पुणे सेशन कोर्ट में हो गया। इसके बाद बृजगोपाल लोया आये, उन्होंने भी अमित शाह के उपस्थित न होने पर सवाल उठाये और सुनवाई की तारीख 15 दिसम्बर 2014 तय कर की,लेकिन 1 दिसम्बर 2014 को ही उनकी मौत हो गयी। उनके बाद सीबीआई स्पेशल कोर्ट में यह मामला जज एमबी गोसवी देख रहे हैं, जिन्होंने दिसम्बर 2014 के आखिर में अमित शाह को इस मामले से बरी करते हुए कहा कि उन्हें अमित शाह के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है।
12 जनवरी 2018 को इसी केस से जुड़े एक मामले में असंतुष्ट होकर और न्यायपालिका की गरिमा और भारत के भविष्य की चिंता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायधीशों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मीडिया को अपनी नाराजगी व्यक्त की। इन चारों जजों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को एक चिट्ठी लिखी। जिसमें जस्टिस लोया की हत्या के फैसले को लेकर असंतुष्टि जाहिर की और अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का भी प्रयोग किया। सुप्रीम कोर्ट के चेलामेश्वर जस्टिस, रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसफ ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आठ पन्नों की चिट्ठी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखी। यह पत्र जस्टिस लोया की मौत को लेकर थी जिस पर  सही ढंग से कार्यवाही नहीं होने पर भी आपत्ति जताई।
जैसा कि हर मीडिया हाउस ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को ऐतिहासिक करार दिया और न्यायपालिका को खतरे में बताया। मीडिया चैनलों में इस पर इन दिनों काफी चर्चा चल रही है मगर इन चार जजों के पन्नों पर नहीं बल्कि इस मुद्दे को भटकाने की कोशिश हो रही है। जबकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने भी इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद अपनी तरफ से यह साफ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट का हर जज बराबर है और उनकी बात सुनी जाएगी।
कांग्रेस पार्टी ने भी हल्के शब्दों में इसे आड़े हाथों लिया और इस पर भाजपा को करारा जवाब देने की कोशिश की मगर भाजपा इस मुद्दे को न्यायपालिका का आंतरिक मामला करार देकर हाथ लगाने की भी कोशिश नहीं कर रहा और कांग्रेस को राजनीति करने से बचने की सलाह दे रहा है। जबकि आपको याद दिला दें यह मुद्दा कुछ पत्रकारों ने गुजरात चुनाव के समय भी उठाया था जिसे कांग्रेस सही ढंग से पकड़ नहीं पाई थी जबकि मोदी संयुक्त भाजपा के कई नेताओं ने अनाप-शनाप बयान देकर इस मुद्दे को दबा भी दिया था।

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