Wednesday, 6 September 2017

रोहिंग्या मुसलमान

म्यांमार की आबादी का अल्पसंख्यक समुदाय 'रेहिंग्या मुस्लिम' अराकान (राखिन) प्रान्त में बसने वाले मुस्लिम लोग हैं। म्यांमार में तक़रीबन 10 लाख रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं,जबकि म्यांमार की बहुसंख्य आबादी बोद्धों की है और इन दोनों समुदाय के बीच खींच-तान बना रहता है ऐसे में जिससे म्यांमार में 'रोहिंग्या मुसलमान' आबादी पर जुल्म होते रहते है।
तंग बेवश होकर रोहिंग्या समुदाय के लोग म्यांमार से सटे भारत, बांग्लादेश, थाईलैंड में शरणार्थी बनकर प्रवेश कर जाते हैं, जो अवैध प्रवासी हैं, जिन्हें सरकार नागरिकता देने से इनकार कर चुकी है। हालांकि ये म्यांमार में पीढियों से रह रहे हैं। रखाइन स्टेट में 2012 से सम्प्रदायिक हिंसा जारी है। इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगो की जाने गई है और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं।
म्यांमार में मोंग्डोव सीमा पर 25 अगस्त के हमले में  9 पुलिस अधिकारियों के मारे जाने के बाद पिछले महीने रखाइन स्टेट में सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया था। सरकार के कुछ अधिकारियों का दावा है कि ये हमला रोहिंग्या समुदाय के लोगों ने किया था। इसके बाद सुरक्षाबलों ने मौगडोव जिला की सीमा को पूरी तरह से बंद कर दिया और एक व्यापक ऑपरेशन शुरू किया।
रोहिंग्या कार्यकर्ताओं का कहना है की अभी तक 100 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और सैकड़ो
लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। म्यांमार के सैनिकों पर मानवाधिकार के उल्लंघन के संगीन आरोप लग रहे है जिसे सरकार सिरे से ख़ारिज कर रही है। इन सब के मद्देनज़र संयुक्त राष्ट्र ने भी म्यांमार की मानव तस्करी पर संज्ञान लेते हुए म्यांमार सरकार को फटकार लगाई है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि रोहिंग्या लड़ाकों द्वारा 25 अगस्त को किये गए हमले के बाद म्यांमार की सेना की कार्रवाई से विस्थापित 1 लाख 23 हज़ार से ज्यादा लोगों ने पड़ोसी देश बांग्लादेश में शरण ली है। बांग्लादेश ने रोहिंग्या शरणार्थियों के आने पर कड़ी आपत्ति जताई है।
रखाइन में जारी हिंसा के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 5 से 7 सितम्बर तक म्यांमार की यात्रा पर हैं और उनका कहना है कि भारत अवैध रूप से रह रहे करीब 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को निर्वासित करेगा।

Saturday, 2 September 2017

ट्रिपल तलाक

 

ट्रिपल तलाक मुस्लिम समुदाय का एक ऐसा कानून जिसने मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के अधीन रहना सिखाया और पुरूषों को भारत देश में सर्वोपरि दर्शाया। इस कानून के खिलाफ मुस्लिम महिलाएं हमेशा प्रयासरत कोशिशें और संघर्ष करते नजर आई है।
22अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार दिया है। जिसका असर महिलाओं में साफतौर पर देखने को मिल रहा है। आज के दिन सभी महिलाएं अपनी आजादी का जश्न मनाने को सड़कों पर नजर आ रही हैं और अपनी राय को बेबाकी से रख रहीं हैं, जो देश की दूसरी आजादी दिवस है जिसने देश की मुस्लिम महिलाओं के साथ इंसाफ कर उन्हें स्वतंत्रता दिलाई।
1973 में बनी मुस्लिमों की एक गैर-सरकारी संस्था आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॅा बोर्ड ने एक कानून बनाया, जो ट्रिपल तलाक के नाम से जाना जाता है, जिसके अनुसार एक वैवाहिक जोड़ी में पुरूष जब भी चाहे वो अपनी अर्धांगिनी को कहीं और कभी भी सिर्फ एक साथ तीन तलाक बोलने पर दोनों के रिश्ते हमेशा-हमेशा के लिए टूट जाएंगे।जिसका मुस्लिम महिलाएं और केंद्र सरकार इसकी आलोचना करती आई है, और इस विरोधाभास में महिला संगठन अक्सर इस कानून के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करती रही है, जिसमें 2017 में हुए एक ऐसे ही कानून का शिकार हुई  'सायारा बानो के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसको मद्देनज़र महिलाओं के हक में फैसला सुनाया।इस निर्णय का सबने खुलकर स्वागत किया।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णायक फैसले के बाद गुलशन प्रवीण, सायरा बानो, आफरीन और कई ऐसी महिलाओं की जीत हुई है, जो इसकी शिकार हुई हैं।
22 अगस्त को इस याचिका की सुनवाई में 5 जजों की बेंच में 5 धर्म (हिन्दू,मुस्लिम,सिख,इसाई,पारसी) के जज ने इसपर कार्यवाही की और 3 जजों ने एक साथ तीन तलाक को बेबुनियादी और असंवैधानिक करार दिया और 22 अगस्त से भारत में ट्रिपल तलाक पर पाबन्दी लगा दी, तो वही भारत के मुख्य न्यायाधीश JS khehar के साथ एक और जज Abdul Nazeer ने इसे संवैधानिक बताया और केंद्र सरकार को इसके खिलाफ संसद में 6महीने के भीतर कानून पारित करके तीन तलाक को हटाने की सलाह दी। इस सलाह के साथ ही ट्रिपल तलाक को ख़त्म करने वाला भारत दुनिया का 23वां राज्य बन गया है।