ट्रिपल तलाक मुस्लिम समुदाय का एक ऐसा कानून जिसने मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के अधीन रहना सिखाया और पुरूषों को भारत देश में सर्वोपरि दर्शाया। इस कानून के खिलाफ मुस्लिम महिलाएं हमेशा प्रयासरत कोशिशें और संघर्ष करते नजर आई है।
22अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक करार दिया है। जिसका असर महिलाओं में साफतौर पर देखने को मिल रहा है। आज के दिन सभी महिलाएं अपनी आजादी का जश्न मनाने को सड़कों पर नजर आ रही हैं और अपनी राय को बेबाकी से रख रहीं हैं, जो देश की दूसरी आजादी दिवस है जिसने देश की मुस्लिम महिलाओं के साथ इंसाफ कर उन्हें स्वतंत्रता दिलाई।
1973 में बनी मुस्लिमों की एक गैर-सरकारी संस्था आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॅा बोर्ड ने एक कानून बनाया, जो ट्रिपल तलाक के नाम से जाना जाता है, जिसके अनुसार एक वैवाहिक जोड़ी में पुरूष जब भी चाहे वो अपनी अर्धांगिनी को कहीं और कभी भी सिर्फ एक साथ तीन तलाक बोलने पर दोनों के रिश्ते हमेशा-हमेशा के लिए टूट जाएंगे।जिसका मुस्लिम महिलाएं और केंद्र सरकार इसकी आलोचना करती आई है, और इस विरोधाभास में महिला संगठन अक्सर इस कानून के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करती रही है, जिसमें 2017 में हुए एक ऐसे ही कानून का शिकार हुई 'सायारा बानो के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसको मद्देनज़र महिलाओं के हक में फैसला सुनाया।इस निर्णय का सबने खुलकर स्वागत किया।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णायक फैसले के बाद गुलशन प्रवीण, सायरा बानो, आफरीन और कई ऐसी महिलाओं की जीत हुई है, जो इसकी शिकार हुई हैं।
22 अगस्त को इस याचिका की सुनवाई में 5 जजों की बेंच में 5 धर्म (हिन्दू,मुस्लिम,सिख,इसाई,पारसी) के जज ने इसपर कार्यवाही की और 3 जजों ने एक साथ तीन तलाक को बेबुनियादी और असंवैधानिक करार दिया और 22 अगस्त से भारत में ट्रिपल तलाक पर पाबन्दी लगा दी, तो वही भारत के मुख्य न्यायाधीश JS khehar के साथ एक और जज Abdul Nazeer ने इसे संवैधानिक बताया और केंद्र सरकार को इसके खिलाफ संसद में 6महीने के भीतर कानून पारित करके तीन तलाक को हटाने की सलाह दी। इस सलाह के साथ ही ट्रिपल तलाक को ख़त्म करने वाला भारत दुनिया का 23वां राज्य बन गया है।
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