अगर आपको ख्याल हो तो हाल ही में बीते कर्नाटक चुनाव के वक्त भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जुड़ा एक मामला खबरों में प्रबलता से नजर आ रहा था उस वक्त अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर को लेकर विवाद खड़ा किया गया था। एक बार फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जोरदार प्रहार किया है योगी आदित्यनाथ ने इस बार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दलित आरक्षण का मुद्दा उठाया है जिस पर कई बुद्धिजीवियों के अलग-अलग विचार सामने दिख रहे हैं। जहां एक तरफ केंद्र सरकार 43 साल पुराने इतिहास आपातकाल को लोकतंत्र का अपमान बताकर काला दिवस मनाने में लगी है तो इन दोनों को ही जोड़ कर पूरी मीडिया वर्तमान की उपलब्धियों और जरूरतों को जनता के समक्ष रखने की बजाय 2019 के आम चुनाव का शंखनाद करने में जुट चुकी है। 2019 के चुनाव का इंतजार तो गली-गली के हर बेरोजगार और क्षेत्रीय दल कर रही हैं। मगर दिलचस्प बात तो यह है कि क्या आखिर के 1 साल केंद्र सरकार सिर्फ अपनी वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देने में लगने की सोच रही है क्योंकि आज की सत्ताधारी पार्टी हर मुद्दे को सुलझाने में सक्षम है फिर भी मुद्दा उठाकर उसे लुप्त कर देना यह देश के बेरोजगारों के साथ एक भद्दा मजाक है। हमें यह बात भी समझनी पड़ेगी कि केंद्र सरकार का मकसद तो कहीं छात्रों के बीच पनप रहे समस्याओं को टरकाने के लिए सेंट्रल यूनिवर्सिटी को ही सीधा निशाना बनाना तो नहीं है!
मुझे तो लगता है कि सरकार को केंद्रीय विश्वविद्यालयों से खेलना और उन्हें प्रोपेगंडा का हथियार बनाना हमारे देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है जिससे सत्ताधारी पार्टी को इसे सार्वजनिक मंच पर उछालने की बजाए लोकतंत्र से मिली बहुमत का सहारा लेकर कानून-व्यवस्था में संशोधन कर विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा और गरिमा को विश्वभर में सम्मानजनक बनाए रखना चाहिए। आज की तारीख में सत्ताधारी दल को जनता के बीच इतिहास की बातों को याद दिलाने से बेहतर अपने कामों की गिनती कराने पर जोड़ देना ही विकास और जनता का विश्वास जीतने का सीढ़ी बन सकती है।
मुझे तो लगता है कि सरकार को केंद्रीय विश्वविद्यालयों से खेलना और उन्हें प्रोपेगंडा का हथियार बनाना हमारे देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है जिससे सत्ताधारी पार्टी को इसे सार्वजनिक मंच पर उछालने की बजाए लोकतंत्र से मिली बहुमत का सहारा लेकर कानून-व्यवस्था में संशोधन कर विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा और गरिमा को विश्वभर में सम्मानजनक बनाए रखना चाहिए। आज की तारीख में सत्ताधारी दल को जनता के बीच इतिहास की बातों को याद दिलाने से बेहतर अपने कामों की गिनती कराने पर जोड़ देना ही विकास और जनता का विश्वास जीतने का सीढ़ी बन सकती है।
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