Tuesday, 13 November 2018

SSC CGL पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पूर्व जयंत की राय!

नौकरी व्यवस्था पाने वाले अभ्यर्थियों के बीच यूपीएससी के बाद दूसरा स्थान रखता है एसएससी सीजीएल। मगर सीजीएल और यूपीएससी के बीच का फर्क अक्सर गहराता देखा गया है। दोनों ही परीक्षा केंद्र सरकार की व्यवस्था से जुड़ी है। जिस तरह आए दिन सीजीएल कंबाइंड ग्रैजुएट लेवल के स्तर को स्टाफ सिलेक्शन कमीशन और केंद्र सरकार की मिलीभगत से गिराने की कोशिश चल रही है उससे ना सिर्फ इन पदों की गरिमा लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों के बीच चरम सीमा पर पहुंच गई है बल्कि अभ्यर्थियों को भी इस उच्च कोटि के पदों की तैयारी के लिए सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है। आखिर इस नौकरी व्यवस्था में किसे गुनहगार ठहराया जाए? क्या इसमें केंद्र सरकार की मिलीभगत का आरोप नाजायज है? आखिर क्यों लगातार कुछ सालों में इस परीक्षा का कार्यभार संभाल रहे Staff Selection Commission के घड़ियाली आंसू देखने को मिलते हैं क्या एसएससी संस्था युवाओं को रोजगार देने में अक्षम है या फिर किसी के दबाव में लाचार है। आखिर कारण जो भी हो मगर युवाओं के साथ इस तरह की कोताही पूरा देश भुगत रहा है। 2013 में हुए धांधली के बाद 2017 में दोबारा घोटालेबाजी न सिर्फ एसएससी और सुप्रीम कोर्ट को ही लचर दिखाता है बल्कि युवाओं का विश्वास सरकारी संस्थानों से दरकिनार होता दिख रहा है।
2017 सीजीएल में बड़े स्तर पर हुए धांधली का आज सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाने जा रही है। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले ही केंद्र सरकार को साफ संकेत दे रखा है कि इस घोटाले भरे परीक्षा को सरकार और एसएससी आपस में तालमेल बिठा कर खुद इस परीक्षा को रद्द करके क्रेडिट अपनी ओर ले जाए वर्ना अगले फैसले के लिए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से एकमात्र धांधली वाले बच्चे के प्रवेश तक को भी बिल्कुल समर्थन नहीं करने की बात कही थी।
तो ऐसे में उच्चतम न्यायालय में चल रहे केस में इस परीक्षा को रद्द करने की ज्यादा संभावना दिखती है। मैं भी धांधली बाजी के विपक्ष में खड़ा हूं और सुप्रीम कोर्ट का पूर्ण रूप से समर्थन करता हूं। भले ही वो अभ्यर्थी जो पूरे परीक्षा में सफल हुए हैं और अपने चयनित पत्र के इंतजार में बैठे है उन्हें भी देश हित में योगदान और बेईमानों के खिलाफ अपनी शुरुआती करियर से ही ईमानदारी की मिसाल कायम करनी चाहिए। चयनित ईमानदार अभ्यर्थियों को दिलासा के अलावा कुछ नहीं दिया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पूर्व मेरी राय यह है कि कोर्ट टायर-2 की परीक्षा को अवश्य स्थगित करे मगर सरकार और एसएससी को भारी फटकार लगाने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए। 2017 के परीक्षा परिणाम घोषित से लेकर नौकरी देने तक की प्रक्रिया को समयावधि में बांधकर फैसला देना चाहिए। अभी से 5 महीने के भीतर ईमानदारी से पूरी परीक्षा, नतीजे और भर्ती प्रक्रिया को समाप्त करना ही एसएससी और सरकार के लिए सबक हो सकती है।

Wednesday, 4 July 2018

Nepotism हमारे देश को बर्बाद कर रहा है!


संजू फिल्म एक बेहद शानदार फिल्म है और इस फिल्म में सभी कलाकारों ने खुद की सीमा को पार कर उम्दा प्रदर्शन पेश किया है। मगर इस फ़िल्म से परे दिलचस्प तो यह है कि जब परिवारवाद की बात आती है तो सभी के जहन में सिर्फ राजनीतिक दल भटकने लगता है जो कि सच भी है मगर न सिर्फ हमारे देश को राजनीतिक परिवारवाद खोखला बना रही है बल्कि साहित्य, चलचित्र जगत से लेकर खेल जगत ने हमारे देश के प्रतिभाओं को दरकिनार करने में कोई कसर नहीं छोड़ा  हैं। सचिन, द्रविड़, मोंगिया और नरेंद्र हिरवानी जैसे दिग्गज खिलाड़ियों के लड़के से लेकर फिल्म जगत में बच्चन परिवार से कपूर खानदान और कई निजी संस्थानों में एक परिवार का वर्चस्व देश में तेजी से बढ़ता जा रहा है। एक ओर आबादी के साथ-साथ बेरोज़गारी का आलम जिस रफ़्तार से सर चढ़कर बोल रहा है उससे देश की साक्षरता दर में वृद्धि के बावजूद हर ओर अपराध का बोलबाला और खाने के लाले पड़े हुए है।
इस लेख का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपने पाठकों को जगाना है वरना इन ड्रामेबाजों की अंधभक्ति में हमें खुद और देश के नवयुवा हुनर को अपने सपने को न्योछावर कर देना पड़ेगा। हमें समाज के कुरीतियों के समानान्तर इस मसले के खिलाफ भी अपनी आवाज़ बुलन्द करनी पड़ेगी।

Tuesday, 26 June 2018

शैक्षणिक संस्थान है केंद्र सरकार का निशाना!

अगर आपको ख्याल हो तो हाल ही में बीते कर्नाटक चुनाव के वक्त भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जुड़ा एक मामला खबरों में प्रबलता से नजर आ रहा था उस वक्त अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर को लेकर विवाद खड़ा किया गया था। एक बार फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जोरदार प्रहार किया है योगी आदित्यनाथ ने इस बार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दलित आरक्षण का मुद्दा उठाया है जिस पर कई बुद्धिजीवियों के अलग-अलग विचार सामने दिख रहे हैं। जहां एक तरफ केंद्र सरकार 43 साल पुराने इतिहास आपातकाल को लोकतंत्र का अपमान बताकर काला दिवस मनाने में लगी है तो इन दोनों को ही जोड़ कर पूरी मीडिया वर्तमान की उपलब्धियों और जरूरतों को जनता के समक्ष रखने की बजाय 2019 के आम चुनाव का शंखनाद करने में जुट चुकी है। 2019 के चुनाव का इंतजार तो गली-गली के हर बेरोजगार और क्षेत्रीय दल कर रही हैं। मगर दिलचस्प बात तो यह है कि क्या आखिर के 1 साल  केंद्र सरकार सिर्फ अपनी वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देने में लगने की सोच रही है क्योंकि आज की सत्ताधारी पार्टी हर मुद्दे को सुलझाने में सक्षम है फिर भी मुद्दा उठाकर उसे लुप्त कर देना यह देश के बेरोजगारों के साथ एक भद्दा मजाक है। हमें यह बात भी समझनी पड़ेगी कि केंद्र सरकार का मकसद तो कहीं छात्रों के बीच पनप रहे समस्याओं को टरकाने के लिए सेंट्रल यूनिवर्सिटी को ही सीधा निशाना बनाना तो नहीं है!
मुझे तो लगता है कि सरकार को केंद्रीय विश्वविद्यालयों से खेलना और उन्हें प्रोपेगंडा का हथियार बनाना हमारे देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है जिससे सत्ताधारी पार्टी को इसे सार्वजनिक मंच पर उछालने की बजाए लोकतंत्र से मिली बहुमत का सहारा लेकर कानून-व्यवस्था में संशोधन कर विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा और गरिमा को विश्वभर में सम्मानजनक बनाए रखना चाहिए। आज की तारीख में सत्ताधारी दल को जनता के बीच इतिहास की बातों को याद दिलाने से बेहतर अपने कामों की गिनती कराने पर जोड़ देना ही विकास और जनता का विश्वास जीतने का सीढ़ी बन सकती है।

Tuesday, 3 April 2018

क्या राजनीतिक दल जाति-धर्म को बांटना ही वोट बैंक का आधार समझती हैं!

1989 में बना अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम पर महाराष्ट्र के मामले में 20 मार्च को देश के सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई करते हुए इस कानून में संशोधन कर दिया है। हमारा भारत देश संसदीय लोकतांत्रिक देश है जिसमें न्यायपालिका की एक अहम भूमिका है। राजनीति से ऊपर उठकर देश के न्यायपालिका से उम्मीद की जाती है। मगर जब देश की पहली स्तंभ की कार्यशैली पर संदेह और उस पर दबाव बनाया जाता है तो परिस्थिति ठीक आज की तरह हो जाती है। जैसा कि आपको याद होगा कि कुछ दिनों पहले ही देश के सर्वोच्च अदालत के चार वरिष्ठ जजों ने आपत्ति जाहिर करते हुए देश की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े किए थे। और एक बार फिर से उच्च न्यायालय को दबाव में देखा जा रहा है। देश के सुप्रीम कोर्ट ने तो पीड़ित और शोषित समुदाय को उनके हित और न्याय के लिए एससी-एसटी एक्ट में बदलाव किया है। इस अधिनियम के तहत निचले समुदाय के लोगों को उठाने का केंद्र सरकार की ओर से एक सफल प्रयास था जिससे लोगों को समान अधिकार और न्याय के अधिकार का देवता माना गया। मगर 28 साल के बाद इस एक्ट में सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम के दुरुपयोग पर बंदिश लगाने के लिए दर्ज मुकदमों में बिना जांच के किसी भी लोक सेवक को गिरफ्तार न किया जाए और सामान्य नागरिकों को भी कानून के तहत पूछताछ के बाद ही गिरफ्तार करने का फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के 2 जजों की बेंच जस्टिस एके गोयल और यू यू ललित ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए एससी एसटी एक्ट के तहत FIR  दर्ज होने पर गिरफ्तारी से पहले आरोपों की डीजीपी स्तर के अधिकारियों की जांच की जाएगी।  जिसके बाद से दलित समुदाय के साथ-साथ राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सारी पार्टियां अपने वोट बैंक को बचाने में जोर-शोर से लग चुकी है। वैसे तो 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान कई लोगों को अधूरी जानकारी भी रही है। फेक न्यूज़ से लोगों में दलितों के आरक्षण को खत्म करने की भी अफवाहें फैलाई गई। और दलित समुदाय को हिंसा भड़काने और उकसाने का भरपूर प्रयास किया गया। देशभर में दलित समुदाय के भारत बंद में विरोध प्रदर्शन ने हर राज्यों के कोने को हिंसात्मक और आक्रमक बना  दिया। इस एक दिन के जोर शोर के प्रदर्शन ने पूरी राजनीति को हिलाकर रख दिया और सभी दलों ने अपने पलडे को साफ करने की कोशिश में जुट गए। जहां एक तरफ केंद्र सरकार भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले पर पुनर्विचार करने की याचिका दायर कर दी और अलग-अलग नेताओं ने अपने वोट बैंक को बनाए रखने के लिए दलितों के साथ सुर में सुर मिला कर सुप्रीम कोर्ट को ही गलत साबित कर दिया। अपनी पुनर्विचार याचिका में केंद्र सरकार का मानना हैं कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ 3 तथ्यों के आधार पर ही कानून को रद्द कर सकती है, इसमें अगर मौलिक अधिकार का हनन हों, अगर कानून गलत बनाया गया हो और अगर किसी कानून को बनाने का अधिकार संसद के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता हो तो। इसके साथ ही सरकार की ये भी दलील है कि कोर्ट ये नहीं कह सकता है कि कानून का स्वरूप कैसा हो, क्योंकि कानून बनाने का अधिकार केवल संसद और विधानसभा के पास है।गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा हमारी सरकार ने अनुसूचित जाति/ जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को‘ कमजोर’ करने के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी है। साथ ही उन्होंने राजनीतिक पार्टियों से कहा कि वे यह सुनिश्चित करें कि विरोध प्रदर्शन की आड़ में किसी तरह की सांप्रदायिक हिंसा को अंजाम न दिया जाए। तो वही विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पत्रकारों से बातचीत में कांग्रेस दलितों की दुर्दशा को लेकर आरएसएस और भाजपा पर हमला बोला और कहा कि वह समुदाय के उन ‘‘भाईयों और बहनों’’ को सलाम करते हैं जो मोदी सरकार से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे हैं। मगर क्या इस देश में ऐसे सहनशील मुद्दे को राजनीति में तब्दील करना ही राजनीतिक दलों का काम रह गया है! क्या सरकार नेपाली भाषा ऊपर उठ चुकी है! क्या अब फेक न्यूज़ ही वोट बैंक का जरिया बनकर रह जाएगी! जिस तरह से सोशल मीडिया सिर चढ़कर बोल रहा है क्या यह देश के भविष्य का प्रारूप बनेगा। जाति और धर्म के नाम पर राजनीति किस हद तक सही है! क्या देश में जनता महंगाई और मूलभूत मुद्दे से ऊपर उठकर वोट करने में विश्वास करने लगी है! जातीय समीकरण को राजनीतिक मुद्दे से हटाने के लिए और देश के हित और विकास के लिए आरक्षण को न्यायपालिका को सौंप देना चाहिए।

Tuesday, 27 February 2018

पत्रकार वफादार या नेता ईमानदार!


अगर आपको याद हो तो निरव मोदी और मेहुल चौकसी के मामले को उजागर हुए 10 दिन से ऊपर हो चुके हैं। पता नहीं आपको याद है भी की नहीं, कि इस घपले के तुरन्त बाद ही देश की सरकार से लेकर पूरी संस्थान इस कदर इन दोनों डिफॉल्टर को देश वापसी और देश की संपत्ति को लुटने वालों से वापस लाने में जुट गई थी जिससे लगा की सच में सरकार मेहनत कर रही है इस बार भी दिखावे में पूरी मीडिया हाउस में उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया दिखाया गया और 7 दिनों के अंदर उनके पासपोर्ट को रद्द ना करने का कारण भी पूछा गया। इसी बीच सरकार के कई मंत्रियों ने प्रधानमंत्री और अपनी पार्टी पर इसकी आंच पहुंचने ना देने का भरपूर प्रयास भी किया जिसमें खुद को दूध का धुला दिखाने के लिए कई झूठ और विपक्षियों पर प्रहार करने से भी नहीं कतराए।
भले ही सरकार की तरफ से मांगे गए जवाब इन दोनों मामा भगीने ने नहीं दिया और सरकार को कशमकश में फंसा दिया, मगर निरव मोदी ने उल्टा भारतीय प्रतिष्ठान पर ही आरोप लगा दिया, उसने पीएनबी पर 11000 करोड़ के अपने लोन को झूठ बोलने और मनगढ़ंत कहानी बता दिया। मोदी ने सरकार को भले ही अपने पासपोर्ट का जवाब नहीं दिया मगर खुद के लीये कर्ज को चुकाने से साफ मना कर दिया और इसके विपरीत सीआईबी के द्वारा निरव के जब्त सम्पत्ति को ही अपने लोन को चुकाने के लिए प्रयाप्त बताया। इस बात को ईडी तक ने स्वीकार कर लिया कि इनकी इतनी सम्पत्ति कर्ज को चुकाने के लिए काफी है। नीरव ने पीएनबी के लगाए गए कर्ज को साफ तौर पर नकार दिया। भले ही सरकार खुद के बचाव में तीव्रता से उतर गई हो मगर सरकारी विभाग पर भगोड़े के लांछन पर किसी तरह की प्रतिक्रिया तक देने से बचती रही। जबकि इस मामले में पीएनबी ने आगे की जानकारी में 27 फरवरी को इस घपले की राशि में निरव के नाम और भी 1400 करोड़ रुपए का ठीकरा फोड़ दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम को मीडिया बहुत मासूम बनकर प्रखरता से देश की जनता तक ईमानदारी से पहुंचाती रही और बखूबी से टीआरपी कमाने का जरिया बना लिया। भले ही आज की मीडिया किसी भी ताजा और प्रमुख खबरों को तेज़ी से उठा देती है और उसे कुछ दिनों तक खास खबर बनाकर चलाती भी है मगर उसका परिणाम अधूरा ही छोड़ देती है जिससे समाज की उन विषाद वाले मुद्दे पर लगाम लग जाती है जिससे हमारे स्वतंत्र देश की जनता भी इससे अछूती रह जाती है। इसके पीछे कुछ राजनीतिक पहल भी होती है जो मीडिया के साथ – साथ जनता का ध्यान भटकाने में भी सक्षम हो जाती है। वैसे इसके पीछे गोदी मीडिया का भी बड़ा हाथ होता है जो कुछ एक  मुद्दे के फिराक में बैठे होते हैं जिससे अपने मालिक की समस्या को जल्द से जल्द सुलझाया जा सके और राजनीतिक दल अपने लूट पात में बिना किसी घबराहट के लगातार बरकरार रह सके। कुछ ऐसे ही मामले हम आपको बताते है जो इस नापाक कारनामे को दर्शाते हैं। महेश शाह, विजय माल्या, ललित मोदी, निरव मोदी, जैसे कई  अनगिनत नाम हैं जो खबरों की कुछ दिनों के लिए सुर्खियां बने और फिर न जाने कहां फुर हो गए। ये ना सिर्फ घोटाले के लिए सदयंत्र के रूप में अवतार में लाया गया बल्कि देश के असल हीरोज और युवाओं की कुर्बानी से भी खेलने की कोशिश की जाती रही है।
मसलन जब किसी दल की क्षति की खबर उभरकर सामने आती है तो उसे हमेशा चैनल वाले ज्यादा महत्ता नहीं देते और कुछ ही तथ्यों के साथ लोगों को भूलवाने का हर प्रयत्न करते है जिससे राजनीतिक दल की छवि के साथ खुद की आय को भी बरकरार रखते हैं।
 जब हम इसके विपरित देखते हैं तो वहीं ताज़ा उदाहरण को देखें तो प्रिया प्रकाश वारियर की बेतुकी खबरों और श्रीदेवी की मृत्यु की पल-पल की अपडेट्स देने में मीडिया चैनल किसी भी स्तर पर जाने को तैयार दिखते है और उनकी रिपोर्ट्स को तोड़ मरोड़ कर बढ़ा-चढ़ा कर पेश की जाती है। ऐसे मामलों की खबरों पर न केवल ज्यादा वक्त के लिए खबरों में बरकरार रखा जाता है बल्कि इसमें अपने विचार को भी व्यक्त किए जाते है और आखिरी मंजिल तक उस बेकार की बातों को कवर कर दिखाया जाता है तो ऐसे में मेरा आपसे यही पूछना है कि क्या उन अपराधियों, भगोड़े, जालिमों पर तथ्यों को जुटा कर इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की जानी चाहिए और ऐसे मुद्दों को तब तक नहीं चलाना चाहिए जब तक उस घोर अन्याय और अपराधों के खिलाफ किसी तरह की शख्त कार्यवाही नहीं हो जाए? जिससे कि समाज के लोगों के बीच जागरूकता के साथ सरकार की आंखे खुली रहे और देश को एक रास्ता दिखाया जा सके।
आज तो हर मुद्दे और छिपाने के लिए दूसरे झूठ का सहारा सरकार को लेना पड़ रहा है। तो क्या देश की पत्रकारिता के साथ जनता भी कुंठित मानसिकता की सोच में जीने लगी है! क्या देश में किसी के जुबान की अहमियत पूरी तरह से ख़तम हो गई है! क्या पत्रकारों के साथ-साथ जनता भी अपने भविष्य को दांव पर लगाने को तैयार हो गई है! क्या आज के लोगों को तथ्य से ज्यादा लोभ-लुभावन बातें ही पसंद आने लगी है! आखिर ऐसी क्या वजह है जो पत्रकारिता को दलदल में ही टीआरपी दिखाई देने लगे हैं! आखिर ऐसी कौन सी वजहें है जिससे पत्रकारिता के मतलब गायब होते चले जा रहे हैं! क्यों लोग असलियत जानने तक से हिचकिचाने लगे है और काम की जगह आकर्षित भाषणों को अहमियत देने लगे हैं! क्या आज की तारीख में देश की जनता से ईमानदार नेतागण हो चुके हैं?

Sunday, 14 January 2018

गुजरात हाईकोर्ट से तड़ीपार घोषित के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के जज ने उठाए सवाल!


मोदी सरकार के चुनावी चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह को सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2010 में तड़ीपार घोषित कर दिया था। सोहराबुद्दीन,उसकी पत्नी की 2005 में एनकाउंटर में हत्या कर दी गई थी। जिसके बाद सोहराबुद्दीन के साथी प्रजापति की भी मर्डर करा दी गई। सोहराबुद्दीन की हत्या की जांच में सीबीआई की अदालत ने डीआईजी डीजी बंजारा और SP राजकुमार को गिरफ्तार किया गया था। बंजारा के कड़े आरोप के बाद अमित शाह पर भी मुकदमा दर्ज किया गया और जुलाई 2010 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन और प्रजापति दोनों के मर्डर को एक ही मामला करार दिया जिसके बाद प्रजापति मर्डर केस में भी अमित शाह का नाम दोबारा दर्ज किया गया। 2012 में अमित शाह को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई और उसी साल अमित शाह अहमदाबाद के नारायणपुरा से विधायक का चुनाव जीते। 2013 में गुजरात के एक उपचुनाव में कांग्रेस ने तड़ीपार अमित शाह को चुनावी रैलियों में शामिल होने के लिए गुजरात हाईकोर्ट में शिकायत दर्ज की थी और इसे कोर्ट की अवहेलना बताया था।
भारत की 16वीं लोकसभा चुनाव से 10 महीने पहले जून 2013 में अमित शाह को यूपी दामोदर सौंपा गया था। जिसे उन्होंने 10 सीटों वाली BJP पार्टी को यूपी में 71 सीट से जीत दिलाई।
सोहराबुद्दीन मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के झिंझरिया गांव का निवासी था। गुजरात पुलिस ने उसे कथित फर्जी मुठभेड़ में 25 नवंबर 2005 को उसके बाद उसकी बीवी कौशल वी और उसके अंडरवर्ल्ड साथी तुलसीराम प्रजापति को मार गिराया था। सोहराबुद्दीन शेख पर 90 के दशक में हथियार तस्करी का मामला दर्ज था। साल 1995 में सोहराबुद्दीन के मध्य प्रदेश स्थित घर से 40 एके-47 बंदूक बरामद हुए थे।
सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई पहले जज की ट्रांसफर कर दी गई और बाद में यह मामला जस्टिस बृज गोपाल लोया को सौंप दिया गया। 1 दिसंबर 2014 को सीबीआई अदालत के जज की हत्या कर दी गई। और अगले जज ने इस मामले में अमित शाह को बरी कर दिया।  जस्टिस लोया को अपनी सहकर्मी की बेटी की शादी में नागपुर जाने का जरा भी मन नहीं था मगर उनके दोस्त साथी जज घर आकर उन्हें उस समारोह में ले गए, यह बात 1 दिसंबर 2014 की है जस्टिस लोया अपने दोस्तों के साथ अपनी सहकर्मी जज सपना जोशी की बेटी की शादी में तो जरुर चल कर गए मगर उधर से उनकी लाश उनके पिता के घर भेज दिया गया। इस मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया जिसकी किसी भी तरह की जांच नहीं कराई गई। यह मुद्दा उस दिन के बाद से शांत हो गया मगर मौत के लगभग 3 साल बाद उनके परिजन ने इसे उठाया तो यह मामला मीडिया और लोगों तक पहुंचा। जस्टिस बृज गोपाल लोया की बहन खुद एक डॉक्टर है जिन्होंने हार्ट अटैक के वजह को बेबुनियाद बताया और इसकी जांच के आदेश की मांग करने लगी। जस्टिस लोया के परिवार जनों ने कारवां मैग्जीन से साक्षात्कार में पोस्टमार्टम की रिपोर्ट पर कई सवाल खड़े किए हैं-
लोया की मौत के समय को स्पष्ट नहीं किया गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार लोया की मौत 6:15 पर हुई है जबकि उनके परिजनों को 5:00 बजे ही फोन कर उनकी मौत की खबर दी जा चुकी थी।

लोया की मौत दिल के दौरे से होना बताया गया, जबकि परिजनों ने उनके कपड़ों पर खून के धब्बे देखे थे।

लोया के पिता के अनुसार उनके सिर पर चोट भी थी.
परिवार को लोया का फोन मौत के कई दिन बाद लौटाया गया, जिसमें से डाटा डिलीट किया गया था।

बताया गया कि रात में दिल का दौरा पड़ने के बाद नागपुर के रवि भवन में ठहरे लोया को ऑटो रिक्शा से अस्पताल ले जाया गया था। लोया की बहन ने रिपोर्टर से बात करते हुए पूछा कि क्या इतने वीआईपी लोगों के ठहरने की व्यवस्था होने के बावजूद रवि भवन में कोई गाड़ी नहीं थी, जो उन्हें अस्पताल ले  जा सकती थी।

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि रवि भवन से सबसे नज़दीकी ऑटो स्टैंड की दूरी दो किलोमीटर है। ऐसे में आधी रात को ऑटो मिलना कैसे संभव हुआ।

एक सवाल ईश्वर बहेटी नाम के आरएसएस कार्यकर्ता पर भी उठाया गया है। इसी कार्यकर्ता ने लोया की मौत के बाद पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव ले जाने की जानकारी परिजनों को दी, साथ ही लोया का फोन भी परिवार को बहेटी ने ही लौटाया था।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के हर पन्ने पर एक व्यक्ति के दस्तखत हैं, जिसके नीचे मृतक से संबंध मराठी में ‘चचेरा भाई’ लिखा है, लेकिन परिवार का कहना है कि परिवार में ऐसा कोई व्यक्ति ही नहीं है।
रिपोर्ट कहती है कि लोया की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, तो फिर पोस्टमॉर्टम की ज़रूरत क्यों पड़ी?
इसके अलावा पोस्टमॉर्टम के बाद पंचनामा भी नहीं भरा गया।
जबकि लोया की मौत के 29 दिनों बाद ही इस केस की सुनवाई किए बिना अमित शाह को बरी कर दिया गया।उसके बाद आज तक इस मामले में 11 अन्य लोग, जिनमें गुजरात पुलिस के आला अधिकारी भी हैं, को बरी किया जा चुका है।
गौर करने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस मामले की जांच संभाल रही प्रमुख संस्था सीबीआई ने इस फैसले के ख़िलाफ़ कोई अपील नहीं की है। इससे पहले जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए गये थे, तब दो बातें स्पष्ट रूप से कही गयी थीं, पहली- इस मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर हो, दूसरी- एक ही जज इस जांच को शुरू से अंत तक देखे। लेकिन शीर्ष अदालत के दूसरे आदेश की अवहेलना की गई। मामले की जांच की शुरुआत जज जेटी उत्पत ने की, लेकिन अचानक वे इससे हटा दिए गए। 6 जून 2014 को जज उत्पत ने अमित शाह को इस मामले की सुनवाई में उपस्थित न होने को लेकर फटकार लगायी और उन्हें 26 जून को पेश होने का आदेश दिया था मगर 25 जून को 2014 को उत्पत का तबादला पुणे सेशन कोर्ट में हो गया। इसके बाद बृजगोपाल लोया आये, उन्होंने भी अमित शाह के उपस्थित न होने पर सवाल उठाये और सुनवाई की तारीख 15 दिसम्बर 2014 तय कर की,लेकिन 1 दिसम्बर 2014 को ही उनकी मौत हो गयी। उनके बाद सीबीआई स्पेशल कोर्ट में यह मामला जज एमबी गोसवी देख रहे हैं, जिन्होंने दिसम्बर 2014 के आखिर में अमित शाह को इस मामले से बरी करते हुए कहा कि उन्हें अमित शाह के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला है।
12 जनवरी 2018 को इसी केस से जुड़े एक मामले में असंतुष्ट होकर और न्यायपालिका की गरिमा और भारत के भविष्य की चिंता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायधीशों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मीडिया को अपनी नाराजगी व्यक्त की। इन चारों जजों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को एक चिट्ठी लिखी। जिसमें जस्टिस लोया की हत्या के फैसले को लेकर असंतुष्टि जाहिर की और अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का भी प्रयोग किया। सुप्रीम कोर्ट के चेलामेश्वर जस्टिस, रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसफ ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आठ पन्नों की चिट्ठी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखी। यह पत्र जस्टिस लोया की मौत को लेकर थी जिस पर  सही ढंग से कार्यवाही नहीं होने पर भी आपत्ति जताई।
जैसा कि हर मीडिया हाउस ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को ऐतिहासिक करार दिया और न्यायपालिका को खतरे में बताया। मीडिया चैनलों में इस पर इन दिनों काफी चर्चा चल रही है मगर इन चार जजों के पन्नों पर नहीं बल्कि इस मुद्दे को भटकाने की कोशिश हो रही है। जबकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने भी इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद अपनी तरफ से यह साफ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट का हर जज बराबर है और उनकी बात सुनी जाएगी।
कांग्रेस पार्टी ने भी हल्के शब्दों में इसे आड़े हाथों लिया और इस पर भाजपा को करारा जवाब देने की कोशिश की मगर भाजपा इस मुद्दे को न्यायपालिका का आंतरिक मामला करार देकर हाथ लगाने की भी कोशिश नहीं कर रहा और कांग्रेस को राजनीति करने से बचने की सलाह दे रहा है। जबकि आपको याद दिला दें यह मुद्दा कुछ पत्रकारों ने गुजरात चुनाव के समय भी उठाया था जिसे कांग्रेस सही ढंग से पकड़ नहीं पाई थी जबकि मोदी संयुक्त भाजपा के कई नेताओं ने अनाप-शनाप बयान देकर इस मुद्दे को दबा भी दिया था।

Tuesday, 2 January 2018

2017 का लेखा-जोखा।

साल 2017 का अंत हो चुका है और 2018 की शुरुआत हो रही है सबसे पहले तो आप सभी के लिए नव वर्ष में आपके जीवन के मंगलमय की कामना करता हूं। साल 2017 गुजरते-गुजरते कई लोगों के लिए यादगार बना तो कुछ इस साल से परेशान रहे। वैसे तो किसी भी साल का आना और जाना लगा रहता है और लोग अपनी मेहनत के बदौलत अपनी मंजिल को हासिल कर समाज के लिए एक आदर्श बन जाते हैं। अगर बात राजनीतिक या सामाजिक की जाए। राजनीतिक गलियारे में 2017 में 7 विधानसभा चुनाव में 6 राज्यों पर भाजपा का राज रहा तो वहीं एक राज्य पंजाब में कांग्रेस को सत्ता हासिल हुई। अगर बात राजनीति की की जाए तो सबसे ज्यादा नुकसान 2017 का किसी ने उठाया है तो वह ‘भारतीय कांग्रेस पार्टी’। जहां कांग्रेस बिहार में सत्ताधारी पार्टियों में शामिल थी और महागठबंधन की सरकार का हिस्सा थी तो नीतीश कुमार ने 2017 में  एक पल में उनका साथ छोड़कर भाजपा का साथ निभा लिया जिससे BJP 29 राज्यों में से अब 19 राज्यों पर अपना दबदबा कायम कर लिया है। कई ऐसी घटना हुई जिसको याद करना भी दर्दनाक होता है, कई रेल दुर्घटना हुई, भारतीय जीडीपी अपनी सबसे निचले पायदान पर घिसकी, पेट्रोल का दाम चरम पर पहुंचा, और आजादी के बाद डॉलर के मुकाबले रुपया सबसे कमजोर हुआ  न्यायपालिका की कड़े और निष्पक्ष फैसले के लिए भी 2017 ऐतिहासिक बन गया है। भारतीय कानून व्यवस्था की सर्वोच्च अदालत ने कई बड़े फैसलों का निर्णय सुनाया जिसने सभी को हक्का-बक्का कर दिया। कई ऐसे रीति-रिवाजों को धर्म से दरकिनार कर दिया जिससे आमजन और महिलाओं को अधीन रहकर गुजर बसर करना पड़ता है। ट्रिपल तलाक, 2G घोटाला, आदिवासी महिला के मामले में नटराजन को बरी करना, आदर्श घोटाला, चारा घोटाला लालू को सजा, जगन्नाथ को बरी जैसे ठोस कदम से लोगों को खुद पर भरोसा दिलाया है। जीएसटी और किसानों से कम दरों पर जमीन अधिग्रहण जैसे कई बड़े फैसलों पर सरकार अपने ही कदम को पीछे लेकर अपनी योजनाओं की विफलता को दर्शाया है। जहां नवंबर 2016 में सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ नोटबंदी जैसे फैसले का 2017 में काली करतूतों का पर्दाफाश हुआ। 2017 के शुरुआती दिनों में जिस व्यक्तित्व को पप्पू का नाम देकर खिल्ली उड़ाया जाता था उसे साल के आखिर में अपनी ही सरजमीं पर कड़ी टक्कर देते देख सभी भाजपा वाले बौखला गए यहां तक कि अपनी कमियों और गलतियों को छिपाने के लिए खुद देश के प्रधानमंत्री ने अपनी अनाप-शनाप बयान से खुद के एजेंडा और सपनों को साकार में लगे रहे। अपनी नाकामी को देखकर सपने का आकार बदल दिया गया,और जोड़-तोड़ से सत्ता हथियाने का काम जारी रहा। अपने एजेंडे को साल 2019 की बजाय 2022 का नाम दे दिया गया। साल 2017 को शुद्धिकरण का साल कहना गलत नहीं होगा। भ्रष्टाचार ओर भ्रष्टाचारियों को तो नहीं पकड़ा जा सका, मगर हमारे देश के प्रधानमंत्री ने एक अच्छा तरकीब निकाला जिससे भ्रष्ट का टैग निकाल फेका जा सके जिससे शुद्धिकरण की योजना चलाई गई और जिसे जेल में डालना था उसे अपने पार्टी में शामिल कर लिया। साल 2017 का मुख्य और अहम विधानसभा चुनाव यूपी में भारी बहुमत से भाजपा ने एकतरफा जीत हासिल की। जिसके लिए जोर-शोर से राम नाम जपा गया। 2014 के लोकसभा चुनाव का गुजरात मॉडल भी 2017 के आख़िर में दिख ही गया। गुजरात का चुनाव प्रचार खूब हंगामेदार और खर्चीला रहा जबकि आपको याद दिला दें की नोटबंदी का असर चुनाव पर देखने को मिलेगा यह कहकर अपनी योजना को सफल बता रहे थे। गुजरात चुनाव हुआ मगर प्रचार में एक बार भी गुजरात मॉडल का जिक्र तक नहीं किया गया और सिर्फ जात धर्म पर चुनाव को केंद्रित किया गया। जहां कांग्रेस ने खुलकर पाटीदारों का समर्थन किया तो वहीं भाजपा ने प्रोपेगंडा के तहत पद्मावती फिल्म और कई मुद्दों को उछालकर चुनाव को जीतने में सफल रही। साल तो बीत गया मगर क्या आपने 2G घोटाले पर कभी विचार किया! आखिर देश का इतना बड़ा घोटाला हुआ ही नहीं था तो क्या यह षड्यंत्र था! साल के आखिरी दिनों में तमिल के सुपरस्टार रजनीकांत ने भी तमिलनाडु के अगले विधानसभा चुनाव में अपनी नई पार्टी बनाकर सभी 234 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया है। जिसकी प्रशंसा अमिताभ बच्चन से कमल हासन तक ने की। साल के आखिरी दिनों में ही देश का सबसे पहला AC लोकल ट्रेन मुंबई में चलाया गया।
जैसा की हम सब नए साल में प्रवेश कर चुके हैं तो आपको यह जानना भी काफी अहम हो जाता है कि आखिर हमारे देश की दशा-दिशा 2018 में क्या रहेगी। आपको बता दें 2018 में 8 विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जबकि 7 विधानसभा का चुनाव 2017 में हुआ था। यह साल इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि केंद्र सरकार 1952, 1956 के तर्ज पर केंद्र और राज्य के चुनाव एक साथ कराने पर विचार कर रही है। जैसा कि अगला लोकसभा चुनाव 2019 में होना है तो ऐसे में 2018 में 2जी घोटाले जैसे कई ऐसे फैसलों पर न्यायपालिका का निर्णय आना है जो अगले लोकसभा चुनाव में लोगों की सोच पर काफी प्रभाव डालेगा। तो आइए आज हम आपको बतला देते हैं ऐसे कौन-कौन से फैसले हैं जिस पर सभी की निगाहें 2018 में टिकी रहेंगी और इससे समाज के साथ-साथ राजनीतिक बदलाव भी देखने को मिल सकता है।
सबसे अहम फैसला 2018 में बाबरी मस्जिद विध्वंस और राम मंदिर को लेकर सर्वोच्च अदालत सुना सकती है। जबकि आपको बता दें 1992 में अयोध्या बाबरी मस्जिद विध्वंस और राम मंदिर मामले से जुड़े जमीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत 3 जजों की बेंच ने इस मामले की सुनवाई 8 फरवरी से लगातार होने की बात कही है।
जबकि आपको पता है हमारे भारत देश की राजधानी में इन दिनों राजनीतिक उठापटक होती दिखती है। आखिर दिल्ली का मुखिया कौन है केंद्र सरकार या फिर दिल्ली सरकार यानी आम आदमी पार्टी। अक्सर इन दो सरकारों के बीच में कई योजना दिल्ली की जनता से अछूती रह जाती है। 6 दिसंबर को दिल्ली के प्रशासनिक बॉस के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के 5 जजों की बेंच ने 15 दिन की सुनवाई को सुरक्षित रखा। जिससे साल 2018 दिल्ली का असल मुखिया का भी निश्चय करेगा।
एडल्टरी मामले पर आएगा 2018 में फैसला। साल 2017 के अंत में एडल्टरी से जुड़ी याचिका सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। दाखिल याचिका में कहा गया है कि महिला के खिलाफ एडल्टरी का केस दर्ज किए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है जबकि 497 आईपीसी धारा के तहत एक ऐसा कानूनी प्रावधान है जिसके तहत किसी शादीशुदा पुरुष किसी शादीशुदा महिला के साथ आपसी सहमति से यौन संबंध बनाता है तो उस महिला का पति एडल्टरी के मामले में केस दर्ज करा सकता है, जब की यह व्यवस्था पुरुषों के साथ नहीं है जिसके खिलाफ केरल के एक व्यक्ति ने आईपीसी 497 को चुनौती दिया है।
आधार कार्ड को लेकर आएगा अहम फैसला-जबकि केंद्र सरकार ने हर योजनाओं और सरकारी व्यवस्था में आधार कार्ड को सम्मिलित करने को अनिवार्य कर दिया है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के फैसले की समय सीमा बढ़ाकर 31 मार्च 2018 कर दिया है। आपको बता दें अभी 31 मार्च तक सभी कल्याणकारी और सेवाओं का लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड को लिंक कराना अनिवार्य है। देश का सर्वोच्च अदालत इस मामले पर 17 जनवरी से सुनवाई शुरू करेगी और आधार निजता का उल्लंघन है या नहीं इसका फैसला 2018 में ही सुनाएगी।
निर्भया कांड मामले पर आ सकता है फैसला। जब भी आपको बता दें पिछले साल ही निर्भया कांड में 4 दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई है। निर्भया हत्याकांड आज से 5 साल पहले 16 दिसंबर को हुआ था। जबकि आरोपियों में से एक दोषी मुकेश ने अपनी एक रिव्यू पिटीशन दर्ज कराई है। मुकेश के वकील की दलील को सुनते हुए सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा था कि आप एक मृतक पीड़िता के माता पिता पर राज्य पुलिस को कुछ दिए जाने के बाद कर रहे हैं ऐसे बिना सबूत के आरोप को बंद कीजिए। आप रिव्यू पिटीशन में ऐसी बातें नहीं कह सकते जबकि अन्य दोषियों ने भी अपनी रिव्यू पिटीशन डालने की मांग रखी है और इसकी सुनवाई आने वाले 22 जनवरी को तय किया गया है।
आखिर में आप सभी को एक बार फिर से नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं और यह साल आपके जीवन के लक्ष्य का अहम हिस्सा बने। यही हमारी मनोकामना है।